प्रेम : एक रचनात्मक शक्ति

“जहा भी जाओ प्रेम बांटते चलो शुरुवात अपने घर से करो अपने बच्चो, पति पत्नी, पडोसी, को प्रेम दो.. जो भी तुमसे मिलने आये पहले से ज्यादा खुश होकर ही लौटे. ईश्वर की दयालुता के जीते जागते उदाहरण बहो : दयालुता अपने समूचे व्यक्तित्व में – अपने चेहरे, आँखों, मुस्कराहट और शब्दों में झलकनी चाहिए.”
– Mother Teresa
कॉलेज के समाजशास्त्र विषय के एक प्रोफेसर ने अपने विद्यार्थी को एक प्रोजेक्ट दिया उन्होंने विद्यार्थी से कहा की वे बाल्टीमोर की झोपड़पट्टी में रहने वाले २०० लड़को का सर्वे करे विद्यार्थी को यह आकलन भी करना था की ये लड़के भविषय में क्या बन सकते है विद्यार्थियों ने सर्वे के तक़रीबन हर आकलन में एक ही टिपण्णी लिखी ” यह लड़का भविषय में खुश नहीं कर सकता, कुछ नहीं बन सकता ” पच्चीस साल बाद समाजशास्त्री के एक अन्य प्रोफेसर उसी कॉलेज में पढ़ने आये और उनकी नजर इस सर्वे पर पड़ी, उनके मन में जिज्ञासा जगी की देखें तो सही इसके निस्कर्स कितने सही है उन्होंने भी अपने विद्यार्थियों को यह पता लगाना था की वे लड़के इस समय क्या कर रहे है और कितने सफल है.
  
तहकीकात से पता chala की २५ साल पहले जिन २०० लड़को का सर्वे किया गया था उनमे से २० या तो बहार जाकर रहने लगे थे या फिर मर चुके थे बहरहाल विद्यार्थियों को यह जानकर बहोत हैरानी हुई की बही १८० लड़को में से १७६ सामान्य से ज्यादा सफल हुए थे और बकील डॉक्टर या व्यवसाय के पेशे में थे.
यह पारा चलने पर प्रोफेसर की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा उन्होंने इस मामले की तह तक जाने का फैसला किया सौभाग्य से सभी लड़के अब भी उसी इलाके में रहते थे प्रोफेसर ने हर लड़के से एक ही सवाल किया ” आपकी सफलता का राज क्या है ? ” सभी ने एक ही जवाब दिया “हमारी टीचर “.
प्रोफेसर ने उस टीचर को खोज कर निकला और उनसे पूछा की आखिर उन्होंने ऐसा कौन सा जादुई फार्मूला इस्तेमाल किया, जिसकी बदौलत ये लड़के झोपड़पट्टी से निकलकर सफता के शिकार पर पहुंच गए.
यह सवाल सुनकर टीचर की आँखों में चमक आ गई और उनके होंठो पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई. उन्होंने कहा ” इसमें कोई जादू नहीं है मई तो बस उन लड़को से प्रेम करती थी “.